माइक के सम्मुख जाकर वे
अन्ट-सन्ट चिल्लाते हैं।
अपना दाग छिपाकर फिर
दूजे का खोल दिखाते हैं।
सड़क, गली, पुलिया, नाला
इन सबकी कसमें खाते हैं।
देते दुहाई फिर विकास की
वे वोटर को भरमाते हैं।
याद नहीं रहता उन सबको
वोटर ही उनका दाता है।
है उनकी कीमत कुछ भी ना
यह उनकी समझ न आता है।
गद्दी मिल जाती जब उनको
फिर वोटर नहीं दिखता है।
वे देते मनमानी से जो
यह वोटर वही तो पाता है।
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