Saturday, December 30, 2017

२०१७ की विदाई और २०१८ का प्रगति हेतु स्वागत के लिए सभी परम प्रिय लोगों को बधाइयां!

Sunday, August 13, 2017

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

शुभ लगन भयो है कृष्ण पाख,
भादों की अब अष्टमी आयी.
राति अंधेरी समय सुहावन,
घनघोर घटा नभ में है छायी.
कांट, करील औ कुंज भये सब,
मुनि विप्रन ने फिर टेर लगायी.
देवकी कोख को धन्य कियो,
कान्हा जैसो है नाम धरायी.

दुष्ट दलन महिमंड़न के हित,
गोकुल आये हैं कृष्ण-कन्हाई.
वृषभान लली जो राधा भयी,
लीला करी फिर रास रचाई.
ब्रजमण्डल की रज धन्य कियो,
गोवर्धन को अंगुरी पे धराई.
आओ पुन: यहि भारत में फिर,
राजनीति की भाषा देउ पढ़ाई.

- छन्दक

Thursday, August 3, 2017

मन अपने बहुत गुमान भरे,








मन अपने बहुत गुमान भरे,
गर्जन मुँह फारि करै बदरा.
 जनु सेन सजाइ के राजा सों,
 रन बीच में आइ भिरै बदरा.
 जो खींचै म्यानते असि चपला,
 चिंघरै, तड़पै औ बरसै बदरा.
 परदेस बसैं हमरे तौ सजन,
 हिय टीस उठै औ जरै बदरा.

जिउ तोर तौ पाहन अस लागै,
हिय मोरि कसक न लखै बदरा.
निज काज ते तुम लागति ऊबे,
अब काज तौ मोर करौ बदरा.
हलकान भयी जिउ हूक उठै,
तन सूखि कै कांट भयो बदरा.
मोबाइल लागति नहिं उनको,
हिय प्रीति को पानी भरौ बदरा.







बूंदन बान लगैं हिय पर,
   अब बेधि रहीं सगरो बदरा.
   बरिआई न तुमसों है कोऊ,
  फिरि काहे कलेस तू दे बदरा.
   काज दियो तुमको इक छोट,
   वोहू न तुमसों सपरो बदरा.
   सांस -उसांस तौ मोरी भई,
   पिय बिन को रोग हरै बदरा.

   - छन्दक

Friday, April 21, 2017

एलोवेरा एक चमत्कारी औषधि





शरीर को स्वस्थ और त्वचा में निखार लाने के लिए हमारे आस-पास कई प्राकृतिक औषधियां मौजूद हैं। प्राकृतिक एंव घरेलू उपचार में एलोवेरा एक ऐसी ही औषधि है। एलोवेरा का इस्तेमाल शरीर के रोगों को दूर करने के लिए ही नहीं बल्कि त्वचा एंव बालों की देखभाल के लिए भी किया जाता है। इसके अलावा एलोवेरा का इस्तेमाल मॉसराइजर के तौर पर भी किया जाता है।

तेज धूप हमारी स्किन और हेल्थ दोनों को नुकसान पहुंचाती है। थकान से हमारी त्वचा पर बुरा असर पड़ता है। वैसे तो बाजार में इस समस्या से बचने के कई विकल्प हैं। लेकिन प्राकृतिक उपचार(एलोवेरा) के द्वारा इसका इलाज काफी लाभदायक होता है। एलोवेरा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसमें एमीनो एसिड और 12 विटामिन्स की भरपूर मात्रा पाई जाती है। जो शरीर में खून की कमी को दूर करता है और शरीर की अंदरूनी सफाई कर हमारे शरीर एंव त्वचा को रोगाणु रहित बनाता है।

एलोवेरा एक उपयोगी औषधि
•सदियों में उपचार के रूप में उपयोग में लाये जाने वाले एलोवेरा में 75 से भी ज़्यादा गुण होते हैं। इसमें 20 तरह के प्रोटीन्स होते हैं जिनमें से 7 शरीर के लिए काफी उपयोगी होते हैं। इसके अलावा एलोवेरा में शारीरिक स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त खनिज, जरूरी विटामिन तथा पोली सशराइड्स होते हैं जो शरीर की घाव भरने की क्षमता को दुरुस्त करते हैं। ऐलोवेरा में अमीनो अम्ल, विटामिन खनिज और कई महत्वपूर्ण एंजाइम होते हैं।
•ऐलोवेरा की पत्तियों से प्राप्त जैल में शरीर को स्वस्थ रखने की अद्भुत शक्ति होती है। जिससे हमारी त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनती है। एलोवेरा एक ऐसा पौधा है जिसे कही पर भी लगाया जा सकता है। इसे सूर्य कि किरणों के साथ पानी की जरूरत भी कम पड़ती है।

•एलोवेरा के पत्ते का निचला हिस्सा औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। पत्ते के नीचे वाले हिस्से को चौड़ाई में काटें और हाथों से इसे खोलें। इससे निकलने वाले पारदर्शी जेल को किनारे से निकालते हुए चेहरे पर लगायें।
•इसके अलावा बाजार में एलोवेरा युक्त कई उत्पाद उपलब्ध हैं। इन उत्पादों का उपयोग कर आप अपने बालों एंव त्वचा को खूबसूरत और आकर्षक बना सकते हैं।
एलोवेरा से होने वाले फायदे-
•चेहरे की सफाई के लिये एलोवेरा एक बेहतरीन स्किन टोनर है। इसका उपयोग चेहरे पर नियमित करने से त्वचा से अतिरिक्त तेल निकलता है। जिससे पिम्पल्स दूर होते हैं।
•चेहरे पर झुर्रियां पड़ने से हम बूढ़े दिखने लगते हैं। हमारी त्वचा भी लटक जाती है। झुर्रियां हमें समय से पहले बूढ़ा बना देती हैं। इससे बचने के लिए रोजाना एलोवेरा जेल से मालिश करें। यह त्वचा को अंदर से मॉइश्चराइज करता है। ऐलोवेरा का रस स्किन को टाइट बनाता है और इसमें मौजूद विटामिन सी से त्वचा हाइड्रेट भी बनी रहती हैं।

•त्वचा की नमी को बरकरार रखने के लिये गुलाब जल में एलोवेरा का रस मिलाकर लगाने से त्वचा की खोई नमी वापस लौटती है।
•एलोवेरा में एंटी बैक्टेरिया और एंटी फंगल जैसे गुण होते हैं। शरीर पर चोट लगने या जलने पर इसका जेल लगाने से आराम मिलता है। जलने के तुरन्त बाद इसके जेल को लगा लेने से छाले नहीं पड़ते और साथ ही जलन भी समाप्त हो जाती है।
•मोटापे और प्रेगनेंसी के कारण हमारे शरीर पर स्ट्रेच मार्क पड़ जाते है। अगर एलोवेरा की मालिश रोज की जाये तो यह काफी हद तक स्ट्रेच मार्क को कम कर देगा।

एलेवेरा का फेस पेक
चेहरे की सुंदरता को निखारने के लिये और कील मुहासों के दागों को हटाने में एलोवेरा अहम भूमिका अदा करता है। इसके लिये आप एक चुटकी हल्दी, एक चम्मच शहद और एक चम्मच दूध में गुलाब जल की कुछ बूंदों को मिलाकर एक अच्छा फेस पेक तैयार कर सकती हैं। फिर आप इसमें थोड़ा सा एलोवेरा का जैल मिला लें और इसे अच्छी तरह से मिक्स करें। अब आप इसे चेहरे और गर्दन पर लगायें। 20 मिनट तक लगाकर रखें और फिर ठंडे पानी से धो दें। इस फेस पेक को आप लगातार 1 हफ्ते तक लगाएं। आपको दाग-धब्बों से झुटकारा मिलेगा।

पिग्मन्टेशन मार्क्स हटाने के लिए एलोवेरा फेस पैक
एलोवेरा और गुलाब जल को मिलाकर पेस्ट तैयार करें। अब आप इसे चेहरे पर लगाएं और कम से कम 15 मिनट के लिए इसे ऐसे ही रहने दें। फिर आप ठंडे पानी से चेहरे को धो लें।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग प्राकृतिक संसाधनों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं और भौतिक संसाधनों को अपना रहे हैं। जिसके फायदे बहुत कम समय के लिए ही होते हैं। हमने आज आपको एलोवेरा के गुणों से परिचित कराया है। जो प्राकृतिक गुणों का भंड़ार है। जिसके कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं और शरीर को भरपूर मात्रा में लाभ मिलता है। यह चेहरे पर चमक लाता है। इसका जैल त्वचा पर लगाने से एक्जिमा, पिंपल और सिरोसिस जैसी समस्यायें भी दूर होती हैं।






Tuesday, April 4, 2017

बासंतिक नवरात्र 8


माँ सिद्धिदात्री


माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं-

माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।
माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।
प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।

नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है।

सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है।

इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है।

विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा , लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है।

ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।

हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।

इस प्रकार यह माता का नवरात्र महापर्व देवी महात्म्य का रसपान कराता हुआ आज सम्पन्न होता है। माँ सभी लोगों पर अपनी कृपा सदैव बरसाती रहे।

* जय माता दी *

बासंतिक नवरात्र 7

माँ महागौरी


माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा |

इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी।' इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।
महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं।

एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”।

महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।

अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं।

माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।

पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत् की ओर प्रेरित करके असत् का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

 माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

( क्रमश: )

Sunday, April 2, 2017

बासंतिक नवरात्र 6

माँ कालरात्रि

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।
सहस्रार चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः माँ कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है। उसे अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है।

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता |
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा | वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||

इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्मांड के सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं।

माँ की नासिका के श्वास-प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभ (गदहा) है। ये ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) है।

माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम 'शुभंकारी' भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है।

माँ कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासकों को अग्नि-भय, जल-भय, जंतु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।

माँ कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उपासना करनी चाहिए। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिए। वे शुभंकारी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती।
हमें निरंतर उनका स्मरण, ध्यान और पूजा करना चाहिए।

नवरात्रि की सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है व दुश्मनों का नाश होता है, तेज बढ़ता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में सातवें दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और कालरात्रि के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।

( क्रमश: )